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परिवर्तन पर कविता

परिवर्तन पर कविता - बदलाव करो(सविता पाटिल)

बदलाव करो, निरंतर करो पर उसमें कुछ बेहतर करो बदलाव हो जो जीवन सरल करे जड़ता को विरल करे बदलाव अज्ञानता से ज्ञान का मूढ़ता से विद्यावान का बदलाव पराधीनता से स्वाधीनता का जाति, धर्म हर भेद से परे बदलाव भिन्नता में एकता का बदलाव जो हारना नहीं लड़ना सिखाये मरना नहीं जीना सिखाये बदलाव ऐसा जो संस्कारों को जीवित करे तुम में बसे राम को ही प्रेरित करे बदलाव नर-नारी के समानता का जिसमे उत्थान मानवता का बदलो ऐसे कि रूढ़-रीतियों की चिता जले भावी-भुवन को एक बेहतर समाज मिले बदलाव जो फिर धरा को हरा करेगा प्रगति पर प्रकृति को न बलि करेगा बदलाव स्वार्थ से सर्वार्थ तक पुरुषार्थ में परमार्थ तक बदलता तेरा अक्स आइना दिख लायेगा बदल ऐसे, कि तू खुद से न कभी नज़र चुरायेगा

मैं क्यों खुद को बदलूँ

परिवर्तन पर कविता

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