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रामधारी सिंह दिनकर कविताएं

रामधारी सिंह दिनकर कविताएं रामधारी सिंह दिनकर कविताएं. रामधारी सिंह दिनकर की कविताएँ हिंदी साहित्य की श्रेष्ठता का प्रतीक हैं। उनकी कविताओं में राष्ट्रीय भावनाओं की गहराई, साहित्यिक उत्कृष्टता, और समाज के प्रति समर्पण का साक्षात्कार होता है। उन्होंने विभिन्न विषयों पर अनेक गाहक कविताएँ लिखी हैं, जो अद्वितीय और प्रेरणादायक हैं।

जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे

वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा सम्भालो, चट्टानों की छाती से दूध निकालो, है रुकी जहाँ भी धार, शिलाएँ तोड़ो, पीयूष चन्द्रमाओं का पकड़ निचोड़ो । चढ़ तुँग शैल शिखरों पर सोम पियो रे ! योगियों नहीं विजयी के सदृश जियो रे ! जब कुपित काल धीरता त्याग जलता है, चिनगी बन फूलों का पराग जलता है, सौन्दर्य बोध बन नई आग जलता है, ऊँचा उठकर कामार्त्त राग जलता है । अम्बर पर अपनी विभा प्रबुद्ध करो रे ! गरजे कृशानु तब कँचन शुद्ध करो रे ! जिनकी बाँहें बलमयी ललाट अरुण है, भामिनी वही तरुणी, नर वही तरुण है, है वही प्रेम जिसकी तरँग उच्छल है, वारुणी धार में मिश्रित जहाँ गरल है । उद्दाम प्रीति बलिदान बीज बोती है, तलवार प्रेम से और तेज होती है ! छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाए, मत झुको अनय पर भले व्योम फट जाए, दो बार नहीं यमराज कण्ठ धरता है, मरता है जो एक ही बार मरता है । तुम स्वयं मृत्यु के मुख पर चरण धरो रे ! जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे ! स्वातन्त्रय जाति की लगन व्यक्ति की धुन है, बाहरी वस्तु यह नहीं भीतरी गुण है ! वीरत्व छोड़ पर का मत चरण गहो रे जो पड़े आन खुद ही सब आग सहो रे! जब कभी अहम पर नियति चोट देती है, कुछ चीज़ अहम से बड़ी जन्म लेती है, नर पर जब भी भीषण विपत्ति आती है, वह उसे और दुर्धुर्ष बना जाती है । चोटें खाकर बिफरो, कुछ अधिक तनो रे ! धधको स्फुलिंग में बढ़ अंगार बनो रे ! उद्देश्य जन्म का नहीं कीर्ति या धन है, सुख नहीं धर्म भी नहीं, न तो दर्शन है, विज्ञान ज्ञान बल नहीं, न तो चिन्तन है, जीवन का अन्तिम ध्येय स्वयं जीवन है । सबसे स्वतन्त्र रस जो भी अनघ पिएगा ! पूरा जीवन केवल वह वीर जिएगा !

आग की भीख

धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा। कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है; मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है? दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे, बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे। प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ। चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ। बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है, कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है? मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा? यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा? आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा, भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा। तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ। ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ। आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है, बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है, अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है, है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है। निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है। निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है। पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता हूँ। जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ। मन की बँधी उमंगें असहाय जल रही हैं, अरमान-आरज़ू की लाशें निकल रही हैं। भीगी-खुली पलों में रातें गुज़ारते हैं, सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं। इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे, पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे। उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ। विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ। आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे, मेरे श्मशान में आ श्रृंगी जरा बजा दे; फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे, हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे। आमर्ष को जगाने वाली शिखा नई दे, अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे। विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ। बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ। ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे, जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे। गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे। इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे। हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे, अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे। प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ, तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ।

मनुष्य और सर्प

चल रहा महाभारत का रण, जल रहा धरित्री का सुहाग, फट कुरुक्षेत्र में खेल रही, नर के भीतर की कुटिल आग। वाजियों-गजों की लोथों में, गिर रहे मनुज के छिन्न अंग, बह रहा चतुष्पद और द्विपद का रुधिर मिश्र हो एक संग। गत्वर, गैरेय,सुघर भूधर से, लिए रक्त-रंजित शरीर, थे जूझ रहे कौंतेय-कर्ण, क्षण-क्षण करते गर्जन गंभीर। दोनों रण-कुशल धनुर्धर नर, दोनों सम बल, दोनों समर्थ, दोनों पर दोनों की अमोघ, थी विशिख वृष्टि हो रही व्यर्थ। इतने में शर के लिए कर्ण ने, देखा ज्यों अपना निषंग, तरकस में से फुंकार उठा, कोई प्रचंड विषधर भुजंग। कहता कि कर्ण ! मैं अश्वसेन, विश्रुत भुजंगों का स्वामी हूँ, जन्म से पार्थ का शत्रु परम, तेरा बहुविधि हितकामी हूँ। बस एक बार कर कृपा धनुष पर, चढ़ शख्य तक जाने दे, इस महाशत्रु को अभी तुरत, स्पंदन में मुझे सुलाने दे। कर वमन गरल जीवन-भर का, संचित प्रतिशोध, उतारूँगा, तू मुझे सहारा दे, बढ़कर, मैं अभी पार्थ को मारूँगा। राधेय ज़रा हँसकर बोला, रे कुटिल ! बात क्या कहता है? जय का समस्त साधन नर का, अपनी बाहों में रहता है। उसपर भी साँपों से मिलकर मैं मनुज, मनुज से युद्ध करूँ? जीवन-भर जो निष्ठा पाली, उससे आचरण विरुद्ध करूँ? तेरी सहायता से जय तो, मैं अनायास पा जाऊँगा, आनेवाली मानवता को, लेकिन क्या मुख दिखलाऊँगा? संसार कहेगा, जीवन का, सब सुकृत कर्ण ने क्षार किया, प्रतिभट के वध के लिए, सर्प का पापी ने साहाय्य लिया। रे अश्वसेन ! तेरे अनेक वंशज हैं छिपे नरों में भी, सीमित वन में ही नहीं, बहुत बसते पुरग्राम-घरों में भी। ये नर-भुजंग मानवता का, पथ कठिन बहुत कर देते हैं, प्रतिबल के वध के लिए नीच, साहाय्य सर्प का लेते हैं। ऐसा न हो कि इन साँपों में, मेरा भी उज्ज्वल नाम चढ़े, पाकर मेरा आदर्श और कुछ, नरता का यह पाप बढ़े। अर्जुन है मेरा शत्रु, किन्तु वह सर्प नहीं, नर ही तो है, संघर्ष, सनातन नहीं, शत्रुता, इस जीवन-भर ही तो है। अगला जीवन किसलिए भला, तब हो द्वेषांध बिगाड़ूँ मैं, साँपों की जाकर शरण, सर्प बन, क्यों मनुष्य को मारूँ मैं? जा भाग, मनुज का सहज शत्रु, मित्रता न मेरी पा सकता, मैं किसी हेतु भी यह कलंक, अपने पर नहीं लगा सकता।

एक पत्र

मैं चरणॊं से लिपट रहा था, सिर से मुझे लगाया क्यों? पूजा का साहित्य पुजारी पर इस भाँति चढ़ाया क्यों? गंधहीन बन-कुसुम-स्तुति में अलि का आज गान कैसा? मन्दिर-पथ पर बिछी धूलि की पूजा का विधान कैसा? कहूँ, या कि रो दूँ कहते, मैं कैसे समय बिताता हूँ; बाँध रही मस्ती को अपना बंधन दुदृढ़ बनाता हूँ। ऎसी आग मिली उमंग की ख़ुद ही चिता जलाता हूँ किसी तरह छींटों से उभरा ज्वाला मुखी दबाता हूँ। द्वार कंठ का बन्द, गूँजता हृदय प्रलय-हुँकारों से, पड़ा भाग्य का भार काटता हूँ कदली तलवारों से। विस्मय है, निर्बन्ध कीर को यह बन्धन कैसे भाया? चारा था चुगना तोते को, भाग्य यहाँ तक ले आया। औ' बंधन भी मिला लौह का, सोने की कड़ियाँ न मिलीं; बन्दी-गृह में अन बहलाता, ऎसी भी घड़ियाँ न मिलीं। आँखों को है शौक़ प्रलय का, कैसे उसे बुलाऊँ मैं? घेर रहे सन्तरी, बताओ अब कैसे चिल्लाऊँ मैं? फिर-फिर कसता हूँ कड़ियाँ, फिर-फिर होती कसमस जारी; फिर-फिर राख डालता हूँ, फिर-फिर हँसती है चिनगारी। टूट नहीं सकता ज्वाला से, जलतों का अनुराग सखे! पिला-पिला कर ख़ून हृदय का पाल रहा हूँ आग सखे!

एक विलुप्त कविता

बरसों बाद मिले तुम हमको आओ जरा बिचारें, आज क्या है कि देख कौम को गम है। कौम-कौम का शोर मचा है, किन्तु कहो असल में कौन मर्द है जिसे कौम की सच्ची लगी लगन है? भूखे, अपढ़, नग्न बच्चे क्या नहीं तुम्हारे घर में? कहता धनी कुबेर किन्तु क्या आती तुम्हें शरम है? आग लगे उस धन में जो दुखियों के काम न आए, लाख लानत जिनका, फटता नही मरम है। दुह-दुह कर जाति गाय की निजतन धन तुम पा लो दो बूँद आँसू न उनको यह भी कोई धरम है? देख रही है राह कौम अपने वैभव वालों की मगर फिकर क्या, उन्हें सोच तो अपन ही हरदम है? हँसते हैं सब लोग जिन्हें गैरत हो वे सरमायें यह महफ़िल कहने वालों को बड़ा भारी विभ्रम है। सेवा व्रत शूल का पथ है गद्दी नहीं कुसुम की! घर बैठो चुपचाप नहीं जो इस पर चलने का दम है।

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है। जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ? मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते; और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते। आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का; आज उठता और कल फिर फूट जाता है; किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो? बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है। मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली, देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू? स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी? आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू? मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते, आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ, और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की, इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ। मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी कल्पना की जीभ में भी धार होती है, वाण ही होते विचारों के नहीं केवल, स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है। स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे, "रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे, रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को, स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।"

मनुष्यता

है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार; पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार। भोग लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम; बह रही असहाय नर कि भावना निष्काम। लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ? यह नहीं यदि ज्ञात तो विज्ञानं का श्रम व्यर्थ। यह मनुज, जो ज्ञान का आगार; यह मनुज, जो सृष्टि का श्रृंगार। छद्म इसकी कल्पना, पाखण्ड इसका ज्ञान; यह मनुष्य, मनुष्यता का घोरतम अपमान।

मेरे नगपति! मेरे विशाल!

मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्, पौरुष के पुन्जीभूत ज्वाल! मेरी जननी के हिम-किरीट! मेरे भारत के दिव्य भाल! मेरे नगपति! मेरे विशाल! युग-युग अजेय, निर्बन्ध, मुक्त, युग-युग गर्वोन्नत, नित महान, निस्सीम व्योम में तान रहा युग से किस महिमा का वितान? कैसी अखंड यह चिर-समाधि? यतिवर! कैसा यह अमर ध्यान? तू महाशून्य में खोज रहा किस जटिल समस्या का निदान? उलझन का कैसा विषम जाल? मेरे नगपति! मेरे विशाल! ओ, मौन, तपस्या-लीन यती! पल भर को तो कर दृगुन्मेष! रे ज्वालाओं से दग्ध, विकल है तड़प रहा पद पर स्वदेश। सुखसिंधु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना की अमिय-धार जिस पुण्यभूमि की ओर बही तेरी विगलित करुणा उदार, जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त सीमापति! तू ने की पुकार, 'पद-दलित इसे करना पीछे पहले ले मेरा सिर उतार।' उस पुण्यभूमि पर आज तपी! रे, आन पड़ा संकट कराल, व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे डस रहे चतुर्दिक विविध व्याल। मेरे नगपति! मेरे विशाल! कितनी मणियाँ लुट गईं? मिटा कितना मेरा वैभव अशेष! तू ध्यान-मग्न ही रहा, इधर वीरान हुआ प्यारा स्वदेश। वैशाली के भग्नावशेष से पूछ लिच्छवी-शान कहाँ? ओ री उदास गण्डकी! बता विद्यापति कवि के गान कहाँ? तू तरुण देश से पूछ अरे, गूँजा कैसा यह ध्वंस-राग? अम्बुधि-अन्तस्तल-बीच छिपी यह सुलग रही है कौन आग? प्राची के प्रांगण-बीच देख, जल रहा स्वर्ण-युग-अग्निज्वाल, तू सिंहनाद कर जाग तपी! मेरे नगपति! मेरे विशाल! रे, रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धीर, पर, फिरा हमें गाण्डीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर। कह दे शंकर से, आज करें वे प्रलय-नृत्य फिर एक बार। सारे भारत में गूँज उठे, 'हर-हर-बम' का फिर महोच्चार। ले अंगडाई हिल उठे धरा कर निज विराट स्वर में निनाद तू शैलीराट हुँकार भरे फट जाए कुहा, भागे प्रमाद तू मौन त्याग, कर सिंहनाद रे तपी आज तप का न काल नवयुग-शंखध्वनि जगा रही तू जाग, जाग, मेरे विशाल

जियो जियो अय हिन्दुस्तान

जाग रहे हम वीर जवान, जियो जियो अय हिन्दुस्तान! हम प्रभात की नई किरण हैं, हम दिन के आलोक नवल, हम नवीन भारत के सैनिक, धीर, वीर, गंभीर, अचल। हम प्रहरी उँचे हिमाद्रि के, सुरभि स्वर्ग की लेते हैं। हम हैं शान्तिदूत धरणी के, छाँह सभी को देते हैं। वीर-प्रसू माँ की आँखों के हम नवीन उजियाले हैं गंगा, यमुना, हिन्द महासागर के हम रखवाले हैं। तन मन धन तुम पर कुर्बान, जियो जियो अय हिन्दुस्तान! - पूरी कविता

कविता का हठ

“बिखरी लट, आँसू छलके, यह सुस्मित मुख क्यों दीन हुआ? कविते! कह, क्यों सुषमाओं का विश्व आज श्री-हीन हुआ? संध्या उतर पड़ी उपवन में? दिन-आलोक मलीन हुआ? किस छाया में छिपी विभा? श्रृंगार किधर उड्डीन हुआ? इस अविकच यौवन पर रूपसि, बता, श्वेत साड़ी कैसी? आज असंग चिता पर सोने की यह तैयारी कैसी? आँखों से जलधार, हिचकियों पर हिचकी जारी कैसी? अरी बोल, तुझ पर विपत्ति आयी यह सुकुमारी! कैसी?” यों कहते-कहते मैं रोया, रुद्ध हुई मेरी वाणी, ढार मार रो पडी लिपट कर मुझ से कविता कल्याणी। “मेरे कवि! मेरे सुहाग! मेरे राजा! किस ओर चले? चार दिनों का नेह लगा रे छली! आज क्यों छोड़ चले? - पूरी कविता

मिथिला

मैं पतझड़ की कोयल उदास, बिखरे वैभव की रानी हूँ मैं हरी-भरी हिम-शैल-तटी की विस्मृत स्वप्न-कहानी हूँ। अपनी माँ की मैं वाम भृकुटि, गरिमा की हूँ धूमिल छाया, मैं विकल सांध्य रागिनी करुण, मैं मुरझी सुषमा की माया। मैं क्षीणप्रभा, मैं हत-आभा, सम्प्रति, भिखारिणी मतवाली, खँडहर में खोज रही अपने उजड़े सुहाग की हूँ लाली। मैं जनक कपिल की पुण्य-जननि, मेरे पुत्रों का महा ज्ञान । मेरी सीता ने दिया विश्व की रमणी को आदर्श-दान। - पूरी कविता

मंजिल दूर नहीं है

वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है; थककर बैठ गये क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है। चिनगारी बन गई लहू की बूँद गिरी जो पग से; चमक रहे, पीछे मुड़ देखो, चरण – चिह्न जगमग – से। शुरू हुई आराध्य-भूमि यह, क्लान्ति नहीं रे राही; और नहीं तो पाँव लगे हैं, क्यों पड़ने डगमग – से? बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है; थककर बैठ गयें क्या भाई! मंजिल दूर नहीं है। अपनी हड्डी की मशाल से हॄदय चीरते तम का, सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश निर्मम का। एक खेय है शेष किसी विधि पार उसे कर जाओ; वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का। - पूरी कविता

विपत्ति में विरोध में

विपत्ति में, विरोध में अडिग रहो, अटल रहो, विषम समय के चक्र में भी साहसी प्रबल रहो। तपा है जो जला है जो चमक उसी में आई है, समस्त ताप-तम में भी बढ़े चलो सफल रहो। - पूरी कविता रामधारी सिंह दिनकर कविताएं न केवल साहित्य के क्षेत्र में बल्कि समाज के उत्थान और सुधार के लिए भी अपने सामाजिक संदेश के लिए भी प्रसिद्ध हैं। उनके काव्य में विचार, भावना, और कल्पना का उच्च स्तर है, जो उन्हें हिंदी साहित्य के अद्वितीय धरोहर में स्थान देता है।

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