Post Page Advertisement [Top]

Dushyant Kumar Poems in Hindi

Dushyant Kumar Poems in Hindi

अब तो पथ यही है

जिंदगी ने कर लिया स्वीकार‚ अब तो पथ यही है। अब उभरते ज्वार का आवेग मद्धिम हो चला है‚ एक हलका सा धुंधलका था कहीं‚ कम हो चला है‚ यह शिला पिघले न पिघले‚ रास्ता नम हो चला है‚ क्यों करूं आकाश की मनुहार‚ अब तो पथ यही है। क्या भरोसा‚ कांच का घट है‚ किसी दिन फूट जाए‚ एक मामूली कहानी है‚ अधूरी छूट जाए‚ एक समझौता हुआ था रौशनी से‚ टूट जाए‚ आज हर नक्षत्र है अनुदार‚ अब तो पथ यही है। यह लड़ाई‚ जो कि अपने आप से मैंने लड़ी है‚ यह घुटन‚ यह यातना‚ केवल किताबों में पढ़ी है‚ यह पहाड़ी पांव क्या चढ़ते‚ इरादों ने चढ़ी है‚ कल दरीचे ही बनेंगे द्वार‚ अब तो पथ यही है।

धर्म

तेज़ी से एक दर्द मन में जागा मैंने पी लिया, छोटी सी एक ख़ुशी अधरों में आई मैंने उसको फैला दिया, मुझको सन्तोष हुआ और लगा –- हर छोटे को बड़ा करना धर्म है।

तीन दोस्त

सब बियाबान, सुनसान अँधेरी राहों में खंदकों खाइयों में रेगिस्तानों में, चीख कराहों में उजड़ी गलियों में थकी हुई सड़कों में, टूटी बाहों में हर गिर जाने की जगह बिखर जाने की आशंकाओं में लोहे की सख्त शिलाओं से दृढ़ औ’ गतिमय हम तीन दोस्त रोशनी जगाते हुए अँधेरी राहों पर संगीत बिछाते हुए उदास कराहों पर प्रेरणा-स्नेह उन निर्बल टूटी बाहों पर विजयी होने को सारी आशंकाओं पर पगडंडी गढ़ते आगे बढ़ते जाते हैं हम तीन दोस्त पाँवों में गति-सत्वर बाँधे आँखों में मंजिल का विश्वास अमर बाँधे। हम तीन दोस्त आत्मा के जैसे तीन रूप, अविभाज्य--भिन्न। ठंडी, सम, अथवा गर्म धूप-- ये त्रय प्रतीक जीवन जीवन का स्तर भेदकर एकरूपता को सटीक कर देते हैं। हम झुकते हैं रुकते हैं चुकते हैं लेकिन हर हालत में उत्तर पर उत्तर देते हैं। हम बंद पड़े तालों से डरते नहीं कभी असफलताओं पर गुस्सा करते नहीं कभी लेकिन विपदाओं में घिर जाने वालों को आधे पथ से वापस फिर जाने वालों को हम अपना यौवन अपनी बाँहें देते हैं हम अपनी साँसें और निगाहें देते हैं देखें--जो तम के अंधड़ में गिर जाते हैं वे सबसे पहले दिन के दर्शन पाते हैं। देखें--जिनकी किस्मत पर किस्मत रोती है मंज़िल भी आख़िरकार उन्हीं की होती है। जिस जगह भूलकर गीत न आया करते हैं उस जगह बैठ हम तीनों गाया करते हैं देने के लिए सहारा गिरने वालों को सूने पथ पर आवारा फिरने वालों को हम अपने शब्दों में समझाया करते हैं स्वर-संकेतों से उन्हें बताया करते हैं-- ‘तुम आज अगर रोते हो तो कल गा लोगे तुम बोझ उठाते हो, तूफ़ान उठा लोगे पहचानो धरती करवट बदला करती है देखो कि तुम्हारे पाँव तले भी धरती है।’ हम तीन दोस्त इस धरती के संरक्षण में हम तीन दोस्त जीवित मिट्टी के कण कण में हर उस पथ पर मौजूद जहाँ पग चलते हैं तम भाग रहा दे पीठ दीप-नव जलते हैं आँसू केवल हमदर्दी में ही ढलते हैं सपने अनगिन निर्माण लिए ही पलते हैं। हम हर उस जगह जहाँ पर मानव रोता है अत्याचारों का नंगा नर्तन होता है आस्तीनों को ऊपर कर निज मुट्ठी ताने बेधड़क चले जाते हैं लड़ने मर जाने हम जो दरार पड़ चुकी साँस से सीते हैं हम मानवता के लिए जिंदगी जीते हैं। ये बाग़ बुज़ुर्गों ने आँसू औ’ श्रम देकर पाले से रक्षा कर पाला है ग़म देकर हर साल कोई इसकी भी फ़सलें ले खरीद कोई लकड़ी, कोई पत्तों का हो मुरीद किस तरह गवारा हो सकता है यह हमको ये फ़सल नहीं बिक सकती है निश्चय समझो। ...हम देख रहे हैं चिड़ियों की लोलुप पाँखें इस ओर लगीं बच्चों की वे अनगिन आँखें जिनको रस अब तक मिला नहीं है एक बार जिनका बस अब तक चला नहीं है एक बार हम उनको कभी निराश नहीं होने देंगे जो होता आया अब न कभी होने देंगे। ओ नई चेतना की प्रतिमाओं, धीर धरो दिन दूर नहीं है वह कि लक्ष्य तक पहुँचेंगे स्वर भू से लेकर आसमान तक गूँजेगा सूखी गलियों में रस के सोते फूटेंगे। हम अपने लाल रक्त को पिघला रहे और यह लाली धीरे धीरे बढ़ती जाएगी मानव की मूर्ति अभी निर्मित जो कालिख से इस लाली की परतों में मढ़ती जाएगी यह मौन शीघ्र ही टूटेगा जो उबल उबल सा पड़ता है मन के भीतर वह फूटेगा, आता ही निशि के बाद सुबह का गायक है, तुम अपनी सब सुंदर अनुभूति सँजो रक्खो वह बीज उगेगा ही जो उगने लायक़ है। हम तीन बीज उगने के लिए पड़े हैं हर चौराहे पर जाने कब वर्षा हो कब अंकुर फूट पड़े, हम तीन दोस्त घुटते हैं केवल इसीलिए इस ऊब घुटन से जाने कब सुर फूट पड़े ।

आग जलती रहे

एक तीखी आँच ने इस जन्म का हर पल छुआ, आता हुआ दिन छुआ हाथों से गुजरता कल छुआ हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा, फूल-पत्ती, फल छुआ जो मुझे छूने चली हर उस हवा का आँचल छुआ प्रहर कोई भी नहीं बीता अछूता आग के संपर्क से दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में मैं उबलता रहा पानी-सा परे हर तर्क से एक चौथाई उमर यों खौलते बीती बिना अवकाश सुख कहाँ यों भाप बन-बन कर चुका, रीता, भटकता छानता आकाश आह! कैसा कठिन ... कैसा पोच मेरा भाग! आग चारों और मेरे आग केवल भाग! सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई, पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोई, वह, समय की प्रतीक्षा में है, जगेगी आप ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप! अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे ।

कौन यहाँ आया था

कौन यहाँ आया था कौन दिया बाल गया सूनी घर-देहरी में ज्योति-सी उजाल गया पूजा की बेदी पर गंगाजल भरा कलश रक्खा था, पर झुक कर कोई कौतुहलवश बच्चों की तरह हाथ डाल कर खंगाल गया आँखों में तिरा आया सारा आकाश सहज नए रंग रँगा थका- हारा आकाश सहज पूरा अस्तित्व एक गेंद-सा उछाल गया अधरों में राग, आग अनमनी दिशाओं में पार्श्व में, प्रसंगों में व्यक्ति में, विधाओं में साँस में, शिराओं में पारा-सा ढाल गया

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है

वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू मैं क्या बताऊँ मेरा कहीं और ध्यान है सामान कुछ नहीं है फटेहाल है मगर झोले में उसके पास कोई संविधान है उस सिरफिरे को यों नहीं बहला सकेंगे आप वो आदमी नया है मगर सावधान है फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए हमको पता नहीं था कि इतना ढलान है देखे हैं हमने दौर कई अब ख़बर नहीं पैरों तले ज़मीन है या आसमान है वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है

समय

नहीं! अभी रहने दो! अभी यह पुकार मत उठाओ! नगर ऐसे नहीं हैं शून्य! शब्दहीन! भूला भटका कोई स्वर अब भी उठता है--आता है! निस्वन हवा में तैर जाता है! रोशनी भी है कहीं? मद्धिम सी लौ अभी बुझी नहीं, नभ में एक तारा टिमटिमाता है! अभी और सब्र करो! जल नहीं, रहने दो! अभी यह पुकार मत उठाओ! अभी एक बूँद बाकी है! सोतों में पहली सी धार प्रवहमान है! कहीं कहीं मानसून उड़ते हैं! और हरियाली भी दिखाई दे जाती है! ऐसा नहीं है बन्धु! सब कहीं सूखा हो! गंध नहीं: शक्ति नहीं: तप नहीं: त्याग नहीं: कुछ नहीं-- न हो बन्धु! रहने दो अभी यह पुकार मत उठाओ! और कष्ट सहो। फसलें यदि पीली हो रही हैं तो होने दो बच्चे यदि प्यासे रो रहे हैं तो रोने दो भट्टी सी धरती की छाती सुलगने दो मन के अलावों में और आग जगने दो कार्य का कारण सिर्फ इच्छा नहीं होती...! फल के हेतु कृषक भूमि धूप में निरोता है हर एक बदली यूँही नहीं बरस जाती है! बल्कि समय होता है!

क्षमा

"आह! मेरा पाप-प्यासा तन किसी अनजान, अनचाहे, अकथ-से बंधनों में बँध गया चुपचाप मेरा प्यार पावन हो गया कितना अपावन आज! आह! मन की ग्लानि का यह धूम्र मेरी घुट रही आवाज़! कैसे पी सका विष से भरे वे घूँट...? जँगली फूल सी सुकुमार औ’ निष्पाप मेरी आत्मा पर बोझ बढ़ता जा रहा है प्राण! मुझको त्राण दो... दो...त्राण...." और आगे कह सका कुछ भी न मैं टूटे-सिसकते अश्रुभीगे बोल में सब बह गए स्वर हिचकियों के साथ औ’ अधूरी रह गई अपराध की वह बात जो इक रात....। बाक़ी रहे स्वप्न भी मूक तलुओं में चिपककर रह गए। और फिर बाहें उठीं दो बिजलियों सी नर्म तलुओं से सटा मुख-नम आया वक्ष पर उद्भ्रान्त; हल्की सी ‘टपाऽटप’ ध्वनि सिसकियाँ और फिर सब शांत.... नीरव.....शांत.......। ये भी देखें-

No comments:

Post a Comment

Bottom Ad [Post Page]