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तुमने न बना मुझको पाया, युग-युग बीते, मैं न घबराया; भूलो मेरी विह्वलता को, निज लज्जा का तो ध्यान करो! अब मत मेरा निर्माण करो! इस चक्की पर खाते चक्कर मेरा तन-मन-जीवन जर्जर, हे कुंभकार, मेरी मिट्टी को और न अब हैरान करो! अब मत मेरा निर्माण करो! कहने की सीमा होती है, सहने की सीमा होती है; कुछ मेरे भी वश में, मेरा कुछ सोच-समझ अपमान करो! अब मत मेरा निर्माण करो! इन्हें भी देखें-
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