मैं अकेला
मैं अकेला;
देखता हूँ, आ रही
मेरे दिवस की सान्ध्य बेला।
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पके आधे बाल मेरे
हुए निष्प्रभ गाल मेरे,
चाल मेरी मन्द होती आ रही,
हट रहा मेला।
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जानता हूँ, नदी-झरने
जो मुझे थे पार करने,
कर चुका हूँ, हँस रहा यह देख,
कोई नहीं भेला
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