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मैं क्यों खुद को बदलूँ - बदलाव पर कविता

 

मैं क्यों खुद को बदलूँ - बदलाव पर कविता
मैं क्यों खुद को बदलूँ - बदलाव पर कविता


मैं, मैं हूँ
और सदा मैं ही रहूँ !

मैं क्यों खुद को बदलूँ ?
मेरी सोच मेरी है
जानता हूँ, ये खरी है !

मेरा हृदय अनमोल है
कुछ है तो प्रेम ही इसका मोल है !

इसे न लालसा केवल धन की
ना ये मांगे ऐशो आराम
ना इसे चाहत वैभव की !

बस दो वक्त की रोटी
और जिंदगी मिले चैन की !

वो बदले खुद को
जिनके हृदय पाषाण होते है, 
जो दिखते तो है जिंदा 
पर बेजान होते हैं !

वो बदले, जो जीवित मर्म भाव
जीवन भर नजर-अंदाज करते हैं
और फिर उन्हीं निस्पंद देहों को
श्रद्धांजलि देते है, याद करते हैं !

बदले उन्हें, 
जो शामिल हैं चूहों की दौड़ में
आत्मीयता से परे
रुपयों की होड़ में !

मैं खुश हूँ, जो मैं हिस्सा नहीं
किसी प्रतियोगिता का.....
मैं खुश हूँ, जो मुझे प्रमाण....
नहीं देना अपनी योग्यता का !

ऐसा नहीं कि मेरे सपने नहीं
ऐसा भी नहीं कि मेरा कोई ध्येय नहीं ! 
बस, बात इतनी सी है
मेरे खुश होने की कोई शर्ते नहीं !

दिल इस बात से खुश हो जाता है
कि कभी-कभार कोई मेरे घर आ जाता है
मन ये देखकर मचल उठता है
कि चांद आज भी मेरे झरोखे से दिखता है !

इस भागती-दौड़ती दुनिया में
ढूंढ लेता है दिल मेरा अपनों को

बढ़ती दूरियों में 
ये समझता है जरूरत मिलने-मिलाने की, 
स्पर्श की भावना मैं जानता हूँ....
चांद को नहीं, मैं इंसानों को छूना चाहता हूँ !

रोज बदलती है दुनिया
पर मैं, मैं ही रहना चाहता हूँ

बाहर कुछ भी दिखे,
पर अपने भीतर
मैं खुद को जिंदा देखना चाहता हूँ !

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